अफ्सोस रिव्यू: हमारे जिंदगी में कुछ पहलू हमेशा से बहुत मायने रखते हैं, जिन्हें हम फिल्मों के माध्यम से महसूस कर सकते हैं. ठीक उसी तरह जब कोई कहानी हमें प्रभावित करती है तो बेशक हम उसे बार-बार देखने की चाह रखते हैं. देखा जाएं तो जीवन, मृत्यु और अमरता हम सभी के लिए हमेशा से आकर्षक का एक केंद्र रहा है.

वैसे आपने अपने जीवन में अपने परिवार, दोस्त, पार्टनर, सहकर्मियों और अन्य लोगों के साथ इन तीन विषयों पर चर्चा की होगी. अगर जवाब हां है तो ठीक है यह बात तो हमारी हुई, लेकिन अगर हम एक अंधेरे, मज़ेदार, रोमांचकारी और रोमांचक शो की कल्पना करें, जो एक तरह से मजाक या खेल की तरह जीवन, मृत्यु और अमरता बनने के बाद हमारे सामने नजर आता है. तो आप क्या कहेंगे.

खैर, गुलशन देवायाह की अभिनीत फिल्म अफ्सोस (अफसोस का मतलब है) क्या है! जानने के लिए पढ़ें.

स्ट्रीमिंग: अमेज़न प्राइम वीडियो

एपिसोड की संख्या: 8

स्टार कास्ट: गुलशन देवैया, अंजलि पाटिल, हीबा शाह, आकाश दहिया, जेमी अल्टार, ललित तिवारी

निर्देशक: अनुभूति कश्यप

अफ्सोस की कहानी अनुभूति कश्यप द्वारा निर्देशित और दिब्या चटर्जी, अनिर्बन दासगुप्ता, सौरव घोष द्वारा लिखित है. यह नकुल के किरदार (गुलशन देवैया द्वारा अभिनीत) पर केंद्रित है, जो एक असफल लेखक और एक आत्म-आलोचनात्मक रूप से हारा हुआ व्यक्ति है. उसके जीवन में एकमात्र उद्देश्य मरना है. कहानी में नकुल ने खुद को 11 बार मारने का प्रयास किया, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह वह विफल हो जाता है. वास्तव में, हर बार जब वह खुद को मारने की कोशिश करता है, तो कोई और मर जाता है. नकुल शुक्ला (अंजलि पाटिल द्वारा अभिनीत) से अपना इलाज करवाता है, जो उनकी आत्महत्या की प्रवृत्ति के बारे में अच्छी तरह से जानती हैं.

खुद को मारने में लगातार असफल होने के बाद, नकुल एक कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करता है. इसके बाद वह एक हिटवुमन को अपनी जान लेने के लिए काम पर रखता है. हालांकि, यह भी काम नहीं करता है. वहीं, उत्तराखंड के एक संत फ़ोकटिया बाबा (ललित तिवारी द्वारा अभिनीत) के बंबई आने से बहुत गड़बड़ हो जाती है. वह अमर आदमी की तलाश में बंबई आते हैं. फिर उत्तराखंड के बीर नाम का एक पुलिसकर्मी (आकाश दहिया द्वारा अभिनीत), लंदन के एक वैज्ञानिक डॉ। गोल्डफ़िश (जेमी ऑल्टर द्वारा अभिनीत) और उपाध्याय, हिटवुमन, जो कि हिबा शाह की पूरी तस्वीर थी. इन सभी के आने से दिक्कतें शुरू होती हैं.

दिबिया, अनिर्बान और सौरव द्वारा लेखन थोड़ा तंग है. इसलिए एपिसोड 22 से लेकर 27 मिनट का है. अनुभूति कश्यप की एक अंधेरी दुनिया की कहानी आपको अंत तक झुकाए रखेगी. अब बात आत्महत्या और मृत्यु के एक विषय के बारे में, जिसमें गलत होने की बहुत अधिक संभावना है. इसे स्क्रीन पर दिखाते समय लेखकों और निर्देशकों ने बहुत ही ध्यान में रखा है. कोएन ब्रदर्स की 1996 की ब्लैक कॉमेडी फिल्म फरगो के संदर्भ में, कश्यप ने चालाकी से हमें उनके किरदार नकुल और अन्य की कहानी सुनाई है.

फिल्म के संवाद आपको गुदगुदाएंगे, जिनमें से मेरी सबसे पसंदीदा है, “मेरे जीवन की कहानी इतनी खराब लिखी गई है, कि मुझे लगता है कि मैंने इसे खुद लिखा है.” मैं यूं कहूं तो यह वेब सीरीज पर भी लागू होता है क्योंकि अगर लेखन बुद्धिमान और हास्यपूर्ण होता, तो निर्माता कभी सफल नहीं होते. वहीं, यह डार्क कॉमेडी, थ्रिलर और सस्पेंस के टोन भी सेट नहीं कर पाते.

अफ्सोस में सभी का प्रदर्शन अभूतपूर्व हैं. गुलशन देवैया सहजता से नकुल की भूमिका निभाते हैं, जिसे देख हमें उनकी स्थिति पर दया नहीं आती है. उनके किरदार में कैरिक्युरिश होने की संभावना थी, लेकिन अच्छी तरह से, वह इसे खींचने में कामयाब रहे. सीरीज में एक और मजबूत किरदार उपाध्याय का है, जो कि शीबा द्वारा निभाया गया हिटवुमन का है. वह लोगों को मारती है, जिसका उसे कोई पछतावा नहीं है (अफ्सोस का मतलब भी है) और वह इसका भरपूर आनंद लेती है.

वहीं, एक जगह जब चिकित्सक शुक्ला ने उससे पूछा कि वह लोगों को क्यों मारती है, तो वह एक दिलचस्प जवाब देती है, जिसे मैं बताकर आपकी एक्साइटमेंट खत्म नहीं करूंगी. इसके लिए आपको सीरीज देखनी होगी. पर हैं एक बात जरूर कहूंगी कि जवाब काफी स्मार्ट था, जिससे हमें पता चलता है कि हत्या करने वाले लोग इस बारे में क्या सोचते हैं. इसके चलते वह कई बार नकुल को मारने में नाकाम हो जाती है तो वह बेवजह खुद को हारा हुआ महसूस करती है. वहीं, बाकि के सहायक कलाकार अद्भुत है.

फिल्म का संगीत किरदार और शो के मूड सेटिंग के लिए अच्छा है. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं हत्या और बंदूकों के बारे में सुखदायक गाने सुन रही हूं. ऐसा लग रहा था कि मैंने पहली बार मृत्यु को गुनगुनाते हुए सुना है. अफ्सोस एक नियमित रूप से डार्क कॉमेडी थ्रिलर नहीं है. यह हमें इस बात की भी महत्वपूर्ण जानकारी देता है कि कुछ लोग अमरता के लिए कितने लालची होते हैं. उन्हें खुद को खत्म करने की कितना लालसा रहती है क्योंकि वह अपने जीवन से परेशान रहते हैं. यह हमारी स्वतंत्रता के साथ एक संबंध भी बनाता है, जो आपको निश्चित रूप से समझ में आएगा. वैसे निर्माता आपको यह उपदेश देने के लिए नहीं हैं बल्कि वह आपको भरपूर रूप से मनोरंजन देने का प्रबंधन करते हैं. ध्रुव सहगल, बिस्वा कल्याण रथ और अन्य द्वारा किया गया कैमियो को मिस नहीं करना चाहिए.

सीरीज एक जिज्ञासु नोट पर समाप्त होती है. खैर, जिस तरह से अफसोस देख के हमें बिलकुल भी अफसोस नहीं हुआ. ठीक उसी तरह इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका सीक्वल जरूर आएगा.

स्टार रेटिंग: 4/5 स्टार्स

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